ये जो देस हैं तेरा, स्वदेस हैं तेरा, तुझे हैं पुकारा
ये वो बंधन हैं, जो कभी टूट नही सकता
मिट्टी की हैं जो खुशबू, तू कैसे भूलाएगा
तू चाहे कही जाए, तू लौट के आएगा
नई नई राहोंमें, दबी दबी आहोंमें
खोए खोए दिल से तेरे, कोई ये कहेगा
ये जो देस हैं तेरा, स्वदेस हैं तेरा,तुझे हैं पुकारा
तुझ से जिंदगी हैं ये कह रही
सब तो पा लिया, अब हैं क्या कमीं
यूँ तो सारे सुख हैं बरसे, पर दूर तू हैं अपने घर से
आ लौट चल तू अब दीवाने
जहा कोई तो तुझे अपना माने
आवाज दे तुझे बुलाने वो ही देस
ये पल हैं वो ही जिस में हैं छूपी, पूरी एक सदी, सारी जिंदगी
तू ना पूछ रास्तें में, काहे आए हैं इस तरह दोराहे
तू ही तो हैं राह जो सुझाए
तू ही तो हैं अब जो ये बताए
जाए तो किस दिशा में जाए वो ही देस
Sunday, September 13, 2009
Wednesday, September 9, 2009
हरिवंशराय बच्चन
सोचा करता बैठ अकेले,
गत जीवन के सुख-दुख झेले,
दंशनकारी सुधियों से मैं उर के छाले सहलाता हूँ!
ऐसे मैं मन बहलाता हूँ!
नहीं खोजने जाता मरहम,
होकर अपने प्रति अति निर्मम,
उर के घावों को आँसू के खारे जल से नहलाता हूँ!
ऐसे मैं मन बहलाता हूँ!
आह निकल मुख से जाती है,
मानव की ही तो छाती है,
लाज नहीं मुझको देवों में यदि मैं दुर्बल कहलाता हूँ!
ऐसे मैं मन बहलाता हूँ!
गत जीवन के सुख-दुख झेले,
दंशनकारी सुधियों से मैं उर के छाले सहलाता हूँ!
ऐसे मैं मन बहलाता हूँ!
नहीं खोजने जाता मरहम,
होकर अपने प्रति अति निर्मम,
उर के घावों को आँसू के खारे जल से नहलाता हूँ!
ऐसे मैं मन बहलाता हूँ!
आह निकल मुख से जाती है,
मानव की ही तो छाती है,
लाज नहीं मुझको देवों में यदि मैं दुर्बल कहलाता हूँ!
ऐसे मैं मन बहलाता हूँ!
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